जय जवान, जय किसान को चरितार्थ करने वाले – बाबा बिरछा ठाकुर लोहार का जीवन और संघर्ष

“जय जवान, जय किसान” नारा को चरितार्थ किए - King of Hammer “आदरणीय बाबा बिरछा ठाकुर लोहार”। एक बेटा को किसान तो दूसरा बेटा जवान बनाये। एक खेत में दिन-रात परिश्रम कर देश के लिए खाद्य सुरक्षा के काम में लगे रहे, तो दूसरा जवान सीमा पर देश की रक्षा में।

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जय जवान, जय किसान को चरितार्थ करने वाले – बाबा बिरछा ठाकुर लोहार का जीवन और संघर्ष



1965 के युद्ध और 'जय जवान, जय किसान' की गूंज

1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध हुआ था, जिसमें भारतीय सैनिकों ने अपनी वीरता और बलिदान से देश की रक्षा की। युद्ध के साथ-साथ देश में खाद्यान्न संकट भी था, क्योंकि भारत उस समय खाद्य उत्पादन में आत्मनिर्भर नहीं था। अमेरिका ने भारत को गेहूं की आपूर्ति रोकने की धमकी दी थी, जिससे हालात और गंभीर हो गए।

इन विकट परिस्थितियों में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने "जय जवान, जय किसान" का नारा दिया। इस नारे ने देशवासियों को आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दी और यह संदेश दिया कि देश की सुरक्षा और खाद्य संप्रभुता दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।

'जय जवान, जय किसान' को साकार करने वाले - आदरणीय बाबा बिरछा ठाकुर लोहार

बाबा बिरछा ठाकुर लोहार ने इस नारे को अपने जीवन में पूरी तरह चरितार्थ किया। अपने बड़े बेटा रामाश्रय ठाकुर लोहार को किसान बनाये, जो देश की खाद्य सुरक्षा में योगदान दिए, जबकि दूसरे छोटा बेटा अशीष ठाकुर लोहार को भारतीय सैनिक, जो सीमा पर राष्ट्र की रक्षा की

बाबा बिरछा ठाकुर लोहार कौन थे?

संक्षिप्त परिचय: बाबा बिरछा ठाकुर लोहार गांव - देवदतवा, चंपारण के एक प्रतिष्ठित किसान और कुशल लोहार थे। उनका संबंध उस परंपरागत लोहार समुदाय से था, जिसने प्राचीन काल से ही समाज की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उपयोगी उपकरण और समाधान विकसित किए। यही वह समुदाय है जिसने लोहा की खोज की, जिसे आज संपूर्ण विश्व की रीढ़ की हड्डी (मेरुदंड) माना जाता है।

चंपारण आंदोलन में बिरछा ठाकुर लोहार

बाबा बिरछा ठाकुर लोहार न केवल किसान और कुशल लोहार थे, बल्कि वे स्वतंत्रता संग्राम के एक सक्रिय सेनानी भी थे। उनका जीवन संघर्ष और त्याग की मिसाल था। उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में किसानों के हक की हुए लड़ाई में भी शामिल रहे, जिसे चंपारण सत्याग्रह (1917) कहा जाता है।

चंपारण सत्याग्रह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक ऐतिहासिक घटना थी, जिसे महात्मा गांधी जी ने 1917 में बिहार के चंपारण जिले में शुरू किया था। हालांकि चंपारण में किसानों का आंदोलन 1907 में ही शुरू हो गया था। इस आंदोलन की मुख्य वजह थी नील की जबरन खेती। ब्रिटिश हुकूमत किसानों को जबरन तीनकठिया प्रथा के तहत अपनी जमीन के 3/20 भाग में नील उगाने के लिए मजबूर कर रही थी, जिससे वे अत्यधिक शोषण और गरीबी के शिकार हो रहे थे। यही चंपारण सत्याग्रह गांधी जी के आगे के सत्याग्रह और आजादी की लड़ाई के लिए आधार बना।

कृषि और लोहारगिरी में योगदान

उनका जीवन कृषि और लोहारगिरी के माध्यम से समाज की उन्नति के लिए समर्पित था। उन्होंने खेती को अधिक सुविधाजनक और उन्नत बनाने के लिए कृषि उपकरणों का निर्माण किया। उनके बनाए हुए हल-फार, कुदाल (फावड़ा), हंसिया, खुरपी और अन्य उपकरणों ने उनके गांव तथा आसपास के दूसरे गांवों के किसानों के लिए खेती को आसान बनाया और कृषि क्रांति में योगदान दिया।

बाबा बिरछा ठाकुर का योगदान

  • कृषि में नवाचार: बाबा बिरछा ठाकुर ने किसानों की समस्याओं को समझते हुए नई कृषि तकनीकों और उपकरणों को विकसित किया, जिससे उत्पादन में वृद्धि हुई।
  • स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा: उन्होंने अपने हाथों से बनाए गए औजारों और उपकरणों से किसानों को आत्मनिर्भर बनने में मदद की, जिससे वे बाहरी संसाधनों पर निर्भर न रहें।
  • देश की सेवा का संकल्प: उन्होंने अपने एक पुत्र को किसान और दूसरे को सैनिक बनाकर यह संदेश दिया कि देश की प्रगति के लिए अन्नदाता और रक्षक दोनों की समान भूमिका होती है।
  • गांव और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती: कृषि और लोहारगिरी के माध्यम से उन्होंने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त किया और लोकल इंडस्ट्री को बढ़ावा दिया। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती में अहम भूमिका निभाया।

बाबा बिरछा ठाकुर लोहार से प्रेरणा

बाबा बिरछा ठाकुर लोहार का जीवन देशभक्ति, त्याग और मेहनत का प्रतीक है। वे हमें यह सिखाते हैं कि देश की सेवा केवल सीमा पर लड़कर ही नहीं, बल्कि खेतों में मेहनत करके और समाज को सशक्त बनाकर भी की जा सकती है।

उनका जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि –

  • किसान केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माता हैं।
  • स्वदेशी उत्पादों और नवाचार को बढ़ावा देना आत्मनिर्भरता की कुंजी है।
  • संघर्ष और मेहनत से ही समाज और देश को आगे बढ़ाया जा सकता है।

निष्कर्ष

"जय जवान, जय किसान" केवल एक नारा नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का मार्गदर्शन है। बाबा बिरछा ठाकुर लोहार जैसे कर्मठ व्यक्तियों ने इसे अपने जीवन में अपनाया और इसे साकार किया। आज हमें भी उनके जीवन से प्रेरणा लेकर अपने कार्यों से देश को मजबूत बनाने का संकल्प लेना चाहिए।

— लेखक: सतीश कुमार शर्मा, 12 दिसंबर, 2020

  • संदर्भ स्रोत: बाबा बिरछा ठाकुर लोहार के बड़े बेटा रामाश्रय ठाकुर लोहार से

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